{115,1}
दिल ही तो है न संग‐ओ‐ख़िश्त दर्द से भर न आए क्यूँ
रोएंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताए क्यूँ
{115,2}
दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आसताँ नहीं
बैठे हैं रह-गुज़र पे हम ग़ैर हमें उठाए क्यूँ
{115,3}
जब वो जमाल-ए दिल-फ़ुरोज़ सूरत-ए मिहर-ए नीम-रोज़
आप ही हो नज़ारा-सोज़ पर्दे में मुंह छुपाए क्यूँ
{115,4}
दशना-ए ग़मज़ा जाँ-सिताँ नावक-ए नाज़ बे-पनाह
तेरा ही अकस-ए रुख़ सही सामने तेरे आए क्यूँ
{115,5}
क़ैद-ए हयात‐ओ‐बंद-ए ग़म अस्ल में दोनों एक हैं
मौत से पहले आदमी ग़म से निजात पाए क्यूँ
{115,6}
हुस्न और उस पे हुस्न-ए ज़ंन रह गई बू अल-हवस की शर्म
अपने पे एतमाद है और को आज़माए क्यूँ
{115,7}
वाँ वो ग़ुरूर-ए इज़्ज़‐ओ‐नाज़ याँ ये हिजाब-ए पास-ए वज़ा
राह में हम मिलें कहाँ बज़्म में वो बुलाए क्यूँ
{115,8}
हाँ वो नहीं ख़ुदा-परस्त जाओ वो बेवफ़ा सही
जिस को हो दीन‐ओ‐दिल अज़ीज़ उस की गली में जाए क्यूँ
{115,9}
ग़ालिब-ए ख़सता के बग़ैर कौन-से काम बंद हैं
रोइये ज़ार ज़ार क्या कीजिये हाए हाए क्यूँ