Saturday, June 11, 2022

A popular gazal from Meer

 

*{485,1}

हस्ती अपनी हबाब की सी है
ये नुमाइश सराब की सी है

[{485,2}]

नाज़ुकी उस के लब की क्या कहये
पंख्ड़ी इक गुलाब की सी है

*{485,3}

चश्म-ए दिल खोल उस भी आलम पर
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है

[{485,4}]

बार बार उस के दर पे जाता हूँ
हालत अब इज़तिराब की सी है

[{485,5}]

नुक़ता-ए ख़ाल से तिरा अबरू
बैत इक इंतिख़ाब की सी है

[{485,6}]

मैं जो बोला कहा कि ये आवाज़
उसी ख़ाना-ख़राब की सी है

[{485,7}]

आतिश-ए ग़म में दिल भुना शायद
देर से बू कबाब की सी है

[{485,8}]

देखिये अब्र की तरह अब के
मेरी चश्म-ए पुर-आब की सी है

*{485,9}

मीर उन नीम-बाज़ आंखों में
सारी मस्ती शराब की सी है

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