[{485,2}]
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहये
पंख्ड़ी इक गुलाब की सी है
*{485,3}
चश्म-ए दिल खोल उस भी आलम पर
याँ की औक़ात ख़्वाब की सी है
[{485,4}]
बार बार उस के दर पे जाता हूँ
हालत अब इज़तिराब की सी है
[{485,5}]
नुक़ता-ए ख़ाल से तिरा अबरू
बैत इक इंतिख़ाब की सी है
[{485,6}]
मैं जो बोला कहा कि ये आवाज़
उसी ख़ाना-ख़राब की सी है
[{485,7}]
आतिश-ए ग़म में दिल भुना शायद
देर से बू कबाब की सी है
[{485,8}]
देखिये अब्र की तरह अब के
मेरी चश्म-ए पुर-आब की सी है
*{485,9}
मीर उन नीम-बाज़ आंखों में
सारी मस्ती शराब की सी है
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