{66,1}
लाज़िम था कि देखो मिरा रस्ता कोई दिन और
तंहा गये क्यूँ अब रहो तंहा कोई दिन और
{66,2}
मिट जाएगा सर गर तिरा पतथर न घिसेगा
हूँ दर पे तिरे नासिया-फ़रसा कोई दिन और
{66,3}
आये हो कल और आज ही कहते हो कि जाऊँ
माना कि हमेशा नहीं अचछा कोई दिन और
{66,4}
जाते हुए कहते हो क़ियामत को मिलेंगे
क्या ख़ूब क़ियामत का है गोया कोई दिन और
{66,5}
हाँ ऐ फ़लक-ए पीर जवाँ था अभी आरिफ़
क्या तेरा बिगड़ता जो न मरता कोई दिन और
{66,6}
तुम माह-ए शब-ए चार-दहम थे मिरे घर के
फिर क्यूँ न रहा घर का वो नक़्शा कोई दिन और
{66,7}
तुम कौन-से थे ऐसे खरे दाद‐ओ‐सितद के
करता मलक उल-मौत तक़ाज़ा कोई दिन और
{66,8}
मुझ से तुम्हें नफ़रत सही नैयर से लड़ाई
बच्चों का भी देखा न तमाशा कोई दिन और
{66,9}
गुज़्री न ब हर हाल ये मुद््दत ख़ुश‐ओ‐ना-ख़ुश
करना था जवाँ-मरग गुज़ारा कोई दिन और
{66,10}
नादाँ हो जो कहते हो कि क्यूँ जीते हैं ग़ालिब
क़िस्मत में है मरने की तमन्ना कोई दिन और
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