{46,1}
जौर से बाज़ आए पर बाज़ आएं क्या
कहते हैं हम तुझ को मुंह दिखलाएँ क्या
{46,2}
रात दिन गर्दिश में हैं सात आस्माँ
हो रहेगा कुछ न कुछ घबराएं क्या
{46,3}
लाग हो तो उस को हम सम्झें लगाओ
जब न हो कुछ भी तो धोका खाएं क्या
{46,4}
हो लिये क्यूँ नामा-बर के साथ साथ
या रब अपने ख़त को हम पहुंचाएं क्या
{46,5}
मौज-ए ख़ूँ सर से गुज़र ही क्यूँ न जाए
आसतान-ए यार से उठ जाएँ क्या
{46,6}
उमर भर देखा किया मरने की राह
मर गये पर देखिये दिखलाएं क्या
{46,7}
पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है
कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या
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