{62,1}
है बसकि हर इक उन के इशारे में निशाँ और
करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमाँ और
{62,2}
या रब वो न समझे हैं न सम्झेंगे मिरी बात
दे और दिल उन को जो न दे मुझ को ज़बाँ और
{62,3}
अबरू से है क्या उस निगा-ए नाज़ को पैवंद
है तीर मुक़र्रर मगर उस की है कमाँ और
{62,4}
तुम शहर में हो तो हमें क्या ग़म जब उठेंगे
ले आएंगे बाज़ार से जा कर दिल‐ओ‐जाँ और
{62,5}
हर-चंद सुबुक-दस्त हुए बुत-शिकनी में
हम हैं तो अभी राह में है संग-ए गिराँ और
{62,6}
है ख़ून-ए जिगर जोश में दिल खोल के रोता
होते जो कई दीदा-ए ख़ून-आबा-फ़िशाँ और
{62,7}
मरता हूँ उस आवाज़ पे हर-चंद सर उड़ जाए
जल्लाद को लेकिन वो कहे जाएं कि हाँ और
{62,8}
लोगों को है ख़ुरशीद-ए जहाँ-ताब का धोका
हर रोज़ दिखाता हूँ मैं इक दाग़-ए निहाँ और
{62,9}
लेता न अगर दिल तुम्हें देता कोई दम चैन
करता जो न मरता कोई दिन आह‐ओ‐फ़िग़ाँ और
{62,10}
पाते नहीं जब राह तो चढ़ जाते हैं नाले
रुकती है मिरी तबा तो होती है रवाँ और
{62,11}
हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अचछे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए बयाँ और
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