Thursday, June 9, 2022

Some popular verses of Ghalib-4

 

{62,1}

है बसकि हर इक उन के इशारे में निशाँ और
करते हैं मुहब्बत तो गुज़रता है गुमाँ और

{62,2}

या रब वो न समझे हैं न सम्झेंगे मिरी बात
दे और दिल उन को जो न दे मुझ को ज़बाँ और

{62,3}

अबरू से है क्या उस निगा-ए नाज़ को पैवंद
है तीर मुक़र्रर मगर उस की है कमाँ और

{62,4}

तुम शहर में हो तो हमें क्या ग़म जब उठेंगे
ले आएंगे बाज़ार से जा कर दिल‐ओ‐जाँ और

{62,5}

हर-चंद सुबुक-दस्त हुए बुत-शिकनी में
हम हैं तो अभी राह में है संग-ए गिराँ और

{62,6}

है ख़ून-ए जिगर जोश में दिल खोल के रोता
होते जो कई दीदा-ए ख़ून-आबा-फ़िशाँ और

{62,7}

मरता हूँ उस आवाज़ पे हर-चंद सर उड़ जाए
जल्लाद को लेकिन वो कहे जाएं कि हाँ और

{62,8}

लोगों को है ख़ुरशीद-ए जहाँ-ताब का धोका
हर रोज़ दिखाता हूँ मैं इक दाग़-ए निहाँ और

{62,9}

लेता न अगर दिल तुम्हें देता कोई दम चैन
करता जो न मरता कोई दिन आह‐ओ‐फ़िग़ाँ और

{62,10}

पाते नहीं जब राह तो चढ़ जाते हैं नाले
रुकती है मिरी तबा तो होती है रवाँ और

{62,11}

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अचछे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अंदाज़-ए बयाँ और

No comments:

Post a Comment

Advice from a Tibetan Master

Always recognize the dreamlike qualities of life and reduce attach- ment and aversion. Practice good-heartedness toward all beings. Be lovin...