आपका पत्र मिला। मुझे पढ़ कर दु:ख हुआ ।…… आज हम कहाँ जा रहे हैं? मेरी समझ में यह बात नहीं आतीं कि हम ऐसा क्यों कहते हैं या मानते हैं कि हमारे देश में एक भी मुस्लिम नहीं रहना चाहिए? ऐसा करेंगे तो मैं आपको कहना चाहता हूँ कि आप फिर गुलाम बननेवाले हैं। “आप” इसलिए लिखता हूँ कि मैं फिर से ग़ुलामी देखना नहीं चाहता हूँ । मेरी उम्मीद है कि वह दिन आएगा उसके पहले ईश्वर मुझे उठा लेगा।
आज हमारा नया साल है।ईश्वर हम सबको सन्मति दे और सही रास्ते पर ले जाए।
१३ नवंबर १९४७
दिल्हीमाँ गान्धीजी पृष्ठ २७०-२७१
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