Thursday, April 11, 2024

मीर के कुछ शेर

 

 मिरे सलीक़े से मेरी निभी मुहब्बत में

तमाम उमर मैं ना-कामियों से काम लिया


धोका है तमाम बहर-ए दुनिया
देखेगा कि होंट तर न होगा

कहा मैं ने कितना है गुल का सबात
कली ने ये सुन कर तबस्सुम किया

आलम आलम इश्क़‐ओ‐जुनूँ है दुनिया दुनिया तुहमत है
दरया दरया रोता हूँ मैं सहरा सहरा वहशत है
 

आब-ए हयात वही न जिस पर ख़िज़्र‐ओ‐सिकंदर मरते रहे
ख़ाक से हम ने भरा वो चशमा ये भी हमारी हिममत थी

हम सर-कशी से मुद्दतों  मसजिद से बच बच कर चले
अब सिजदे ही में गुज़्रे है क़द जो हुआ मिहराब-सा

बुताँ के इश्क़ ने बे-इख़्तियार कर डाला
वो दिल कि जिस का ख़ुदाई में इख़्तियार रहा

गली में उस की गया सो गया न बोला फिर
मैं मीर मीर कर उस को बहुत पुकार रहा

हैं मुश्त-ए ख़ाक लेकिन जो कुछ हैं मीर हम हैं
मक़दूर से ज़ियादा मक़दूर है हमारा

कुछ न देखा फिर ब जुज़ इक शुला-ए पुर-पेच‐ओ‐ताब
शमा तक तो हम ने देखा था कि परवाना गया

मस्तूरी ख़ूब-रूई दोनों न जमा होवें
ख़ूबी का काम किस की इज़हार तक न पहुंचा


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